हिंदुस्तान की पहली बोलती गाती फिल्म आलम आरा के जन्म की कहानी में कोई ड्रामा नहीं था. आर्देशिर ईरानी ने एक बोलती इंग्लिश फिल्म देखी -शो बोट. इसमें गाने भी थे. आर्देशिर ने तय कर लिया था कि अब से वो साइलेंट फिल्म्स नहीं बनाएंगे और हिंदुस्तान की पहली बोलती गाती फिल्म बनाने का ज़िम्मा उन्होंने अपने सर ले लिया था. ईरानी की कंपनी इम्पीरियल मूवीटोन में कई कलाकार और तकनीशियन काम किया करते थे. उन दिनों टेक्नीशियंस को ही फिल्मों में अभिनय का मौका मिल जाना कोई बड़ी बात नहीं थी. कुछ कलाकार तो ऐसे भी थे जो स्टूडियो की फिल्मों का निर्देशन भी कर चुके होते थे.

आर्देशिर के साथ एक नया शख्स काम करता था – मेहबूब खान. बड़ौदा के एक पुलिसवाले का बेटा, मेहबूब बहुत काम उम्र में भाग कर मुंबई आ गया था. किसी की जान पहचान की मदद से वो इम्पीरियल मूवीटोन में आर्देशिर से मिला. आर्देशिर ने उसे पहले तो वापस घर लौट जाने को कहा, मगर फिल्मों के प्रति दीवानगी देखते हुए उसे स्टूडियो में एक्स्ट्रा का काम करने को कहा. कई महीनों तक काम किया मगर कोई बड़ा ब्रेक नहीं लगा. फिर एक दिन, अलीबाबा और 40 चोर नाम की फिल्म में काम मिला मगर रोल था मटके के अंदर बंद चोर का. मेहबूब स्क्रीन पर नज़र भी नहीं आया. एक दिन एक फिल्म में उसे घोड़े की सवारी करने का शॉट देना था. घोड़े को एक नए लड़के का उस पर सवारी करना पसंद नहीं आया और शॉट के दौरान ही वो बिफर गया. कैमरा ने पूरा शॉट कैप्चर किया. आर्देशिर ने शॉट देखा और मेहबूब को बुला कर उसके साहस की तारीफ की. उसके बाद से मेहबूब इम्पीरियल के एक अभिन्न सदस्य बन गए. जब आलम आरा बनाने का निर्णय लिया जा रहा था, आर्देशिर के दिमाग में मेहबूब खान को बतौर हीरो लेने का ख्याल आया. मामला तय ही था मगर फाइनैंसर ने मेहबूब की जगह किसी पॉपुलर हीरो को लेने की बात कही. चूंकि फिल्म एक बहुत ही महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट थी, इसलिए मेहबूब की जगह उस समय के पॉपुलर हीरो मास्टर विट्ठल को साइन किया गया. मेहबूब खान ने आगे जा कर मदर इंडिया जैसी महान फिल्म निर्देशित की थी.

मास्टर विट्ठल बने हीरो
विट्ठल स्टंट फिल्मों में काम करते थे, बढ़िया कद काठी थी, तलवार भांजते थे और पहलवानी का शौक़ रखते थे. मास्टर विट्ठल ने अपनी शुरुआत मराठी नाटकों से की थी. फिर बाबूराव पेंटर की फिल्म कंपनी महाराष्ट्र फिल्म्स में बतौर एडिटर काम करने लगे और छोटे मोटे रोल भी करते. बाबूराव पेंटर की फिल्म कल्याण खजिना में उन्होंने बतौर महिला नर्तकी भी काम किया. कुछ साल गुजरने के बाद उन्होंने 1925 में शारदा स्टूडियोज में नौकरी कर ली. शारदा स्टूडियोज़ के मालिक थे भोगीलाल दवे जो आर्देशिर ईरानी के साथ स्टार फिल्म्स में हिस्सेदार थे. दवे ने फिल्म निर्देशन के अपने अनुभव को लेकर हाथ मिलाया एक और निर्देशक नानूभाई देसाई से. साथ जुड़े आनंद प्रसाद कपूर और हर्षद राय मेहता, जिन्होंने मास्टर विट्ठल को 1926 की फिल्म रतन मंजरी में हीरो का रोल दिया. नानूभाई देसाई स्टंट फिल्में बनाने के चैंपियन थे और पहलवान विट्ठल उन्हें फिल्मों ने हमेशा हीरो बनते रहे. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर बनी कई फिल्मों में विट्ठल ने काम किया. सुपर हिट हो गए. दर्शकों के चहीते. स्क्रीन पर आते ही सीटियां बजती, साफे उछाले जाते. 1930 आते आते तो मास्टर विट्ठल, सबसे महंगे हीरो बन चुके थे. उनके रोल्स और एक्शन देख कर उन्हें हिंदी फिल्मों का “डगलस फेयरबैंक्स” कहा जाने लगा. विट्ठल को ये नाम क़तई पसंद नहीं था. खैर, आर्देशिर ईरानी की मजबूरी थी एक सफल सितारा लेने की, तो उन्होंने चुपके से मास्टर विट्ठल से संपर्क किया. पैसों की बात तय हुई, विट्ठल का मेहनताना, शारदा स्टूडियोज की उनकी आमदनी से ज़्यादा था. समस्या थी कि विट्ठल का कॉन्ट्रैक्ट शारदा के साथ था, लेकिन विट्ठल ये बात जानते थे कि उनका नाम अजर अमर हो जायेगा अगर वो भारत की पहली बोलती फिल्म में काम कर लेंगे. उन्होंने शारदा के साथ अपना कॉन्ट्रैक्ट तोड़ दिया और आर्देशिर के इम्पीरियल फिल्म्स के साथ नया करार किया.

आलम आरा बनने में रहा मोहम्मद अली जिन्ना का भी रोल
शारदा फिल्म्स के नानूभाई विशुद्ध रूप से व्यावसायिक फिल्म निर्माता थे. उन्हें ये बात बहुत बुरी लगी और उन्होंने मास्टर विट्ठल पर केस कर दिया. आर्देशिर ईरानी बुरी तरह फंस गए तब उन्होंने एक तेज़ तर्रार और सफल वकील खोजा. संभवतः उस वक़्त वो हिंदुस्तान के गिने चुने मुस्लिम वकीलों में से थे. उनका नाम था – मोहम्मद अली जिन्ना. जी हाँ, हिंदुस्तान- पाकिस्तान विभाजन की कहानी से कहीं पहले जिन्ना एक ज़बरदस्त बैरिस्टर थे. वैसे जिन्ना के मन में भी कभी एक्टिंग का भूत चढ़ा था. लंदन में जब वो पढ़ रहे थे तो वो शेक्सपीयर के नाटकों का मंचन करनेवाली एक कंपनी से जुड़ भी गए थे हालाँकि उनके पिता ने उनकी जम कर डांट लगायी और जिन्ना चुपचाप कानून की पढाई करने लगे. जब उन्हें ये केस मिला तो संभवतः उन्हें अपने दिन याद आ गए और उन्होंने अपने पूरे कानूनी दांव पेंच इस्तेमाल करते हुए मास्टर विट्ठल को शारदा फिल्म्स के कॉन्ट्रैक्ट से मुक्ति दिलाई, और आर्देशिर ईरानी को भारत की पहली बोलती फिल्म का हीरो. ये बात और है कि मास्टर विट्ठल, मूक फिल्मों के सुपरस्टार थे मगर जब डायलॉग वोलने की बारी आयी, तो मामला टांय टांय फिस्स हो गया. न वो ठीक से उर्दू बोल पाते थे, न हिंदुस्तानी और न ही उनकी डायलॉग डिलीवरी में शाही वज़न था. सिर्फ मास्टर विट्ठल की वजह से आर्देशिर ने लेखक जोसफ से कहानी में बदलाव करवाया. फिल्म के अधिकाँश हिस्से में मास्टर विट्ठल ने बहुत कम डायलॉग बोले हैं. फिल्म में उन्हें या तो बेहोश दिखाया गया या फिर किसी तरह के नशे में.ज़ुबैदा – बोलती फिल्मों की पहली हेरोइन
फिल्म आलम आरा की हीरोइन की तलाश ज़्यादा मुश्किल नहीं थी. सुलोचना उर्फ़ रूबी मायर्स पहले से आर्देशिर की फिल्मों में काम करती आ रही थीं और उन्हें हीरोइन लेना लगभग तय था. मगर सुलोचना के साथ समस्या ये थी कि वो ज्यूइश थीं. न हिंदी ठीक से बोल पाती थीं, न उर्दू और न ही फिल्मवालों की हिंदुस्तानी ज़बान. मतलब, मामला मास्टर विट्ठल जैसा ही था. आर्देशिर की तलाश ख़त्म हुई ज़ुबैदा पर जो गुजरात के सूरत शहर के नवाब इब्राहिम मोहम्मद याकूत खान तृतीय और फातिमा बेगम की सुपुत्री थी. ज़ुबैदा ने बाद में हैदराबाद के महाराज नरसिंहगीर धनराजगीर ज्ञान बहादुर से शादी की. ज़ुबैदा की पुत्री दुर-ए-शाहवार धनराजगीर ने रेमंड पिल्लई से शादी की और उनकी पुत्री रिया पिल्लई भी शौकिया अभिनेत्री के तौर पर हिंदी फिल्मों में काम कर चुकी हैं. रिया ने मशहूर फिल्मस्टार संजय दत्त से शादी की थी और तलाक के बाद मशहूर टेनिस प्लेयर लीएंडर पेस के साथ उनके रिश्ते बने जिनके साथ उनकी एक बेटी भी हैं. हालाँकि रिया अब लीएंडर के साथ नहीं हैं और श्री श्री रविशंकर के ‘आर्ट ऑफ़ लिविंग” फाउंडेशन के साथ जुडी हुई हैं. ज़ुबैदा की दोनों बहनें सुल्ताना और शहज़ादी भी अभिनेत्रियां थी. ज़ुबैदा 12 साल की उम्र से ही फिल्मों में काम करने लगी थी. 1937 में ज़ुबैदा ने महान फ़िल्मकार प्रथमेश बरुआ की आसामी फिल्म “देवदास” (शरतचंद्र चट्टोपाध्याय) में पारो का किरदार निभाया था. इसके एक साल पहले प्रथमेश बरुआ के. एल. सहगल के साथ देवदास हिंदी में बनायीं थी.

ज़ुबैदा की माँ फातिमा बेगम – हिंदुस्तान की पहली महिला फिल्म डायरेक्टर
ज़ुबैदा के माता पिता की शादी का कोई रिकॉर्ड नहीं है. और कहते हैं कि नवाब साहब ने फातिमा से अपने रिश्ते को कभी स्वीकार भी नहीं किया. संभवतः इसीलिए फातिमा बेग़म और उनकी तीनो बेटियों को फिल्मों में काम कर के अपनी ज़िन्दगी चलनी पड़ी.यहाँ गौरतलब बात ये है की फातिमा बेग़म को हिंदुस्तान की पहली महिला फिल्म डायरेक्टर कहा जाता है जिन्होंने अपनी कंपनी फातिमा फिल्म्स के बैनर तले 1926 में बुलबुल-ए-परिस्तान नाम की फिल्म डायरेक्ट की थी. स्पेशल इफेक्ट्स वाली इस फिल्म का बजट भी भारी भरकम था. फातिमा ने कई फंतासी फिल्में डायरेक्ट की और तकरीबन सभी में स्पेशल इफेक्ट्स और ट्रिक फोटोग्राफी का इस्तेमाल किया था. ज़ुबैदा और उनकी दो बहनें सुलताना और शहज़ादी, तीनों की फिल्म एक्ट्रेस थीं. खास बात ये है कि उन दिनों अच्छे घर की लड़कियों का फिल्मों में काम करना बहुत खराब माना जाता था. 1911 में जन्मी ज़ुबैदा ने 12 साल की उम्र में फिल्मों में कदम रखा. छोटे रोल्स से लेकर प्रमुख हीरोइन बनने तक का उनका सफर ज़बरदस्त रहा. आर्देशिर की पहली निर्देशित फिल्म “वीर अभिमन्यु” में ज़ुबैदा की माँ फातिमा बेग़म हीरोइन थीं, और ज़ुबैदा ने भी उसमें एक रोल किया था. इसी वजह से आर्देशिर को उन्हें साइन करने में कोई विशेष दिक्कत नहीं हुई.

पृथ्वीराज कपूर और एलवी प्रसाद भी थे आलम आरा में
इस फिल्म में कुछ और अनूठे कलाकार भी थे. जैसे कि पृथ्वीराज कपूर. 1928 में बे-धारी तलवार नाम की फिल्म में एक्स्ट्रा का रोल करने वाले पृथ्वीराज की ज़बरदस्त पर्सनालिटी और कड़क आवाज़ की वजह से जल्दी ही फिल्मों में बड़े रोल करने लगे.आलम आरा में उन्होंने रियासत के प्रधान मंत्री आदिल खान की भूमिका अदा की थी और इन्हीं की बेटी बनी थी ज़ुबैदा – यानी आलम आरा. इस फिल्म में एक कलाकार और थे एलवी प्रसाद जिन्होंने सुल्तान सलीम खान की भूमिका अदा की थी. तेलुगु फिल्म इंडस्ट्री से शुरू कर के, तमिल और हिंदी फिल्मों का सतत सफल सफर करने वाले प्रसाद को भारतीय सिनेमा में उनके योगदान के लिए दादा साहेब फाल्के पुरुस्कार से नवाज़ा गया था. इनके अलावा एक अदाकारा भी थी जिनका नाम था जिल्लू, जिन्होंने आगे चल कर मदर इंडिया में नरगिस की सास और मुग़ल-ए-आज़म में अनारकली की माँ का किरदार निभाया था.

आलम आरा की कहानी
आलम आरा एक पारसी नाटक पर आधारित कहानी थी जिसमें लेखक जोसफ ने बाइबिल, रामायण और कुछ पॉपुलर किस्सों के छोटे छोटे अंश मिलाये थे. कहानी एक काल्पनिक रियासत कुमारपुर की है जहाँ के सुल्तान सलीम खान की दो पत्नियां थीं – दिल बहार और नौबहार. एकदिन रियासत में एक फ़कीर आता है जो भविष्यवाणी करता नौबहार को जल्द ही पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी जो रियासत का वारिस होगा. इस बात से दूसरी रानी यानि दिलबहार के कलेजे पर सांप लोट जाते हैं. बदले की भावना से भरी हुई दिलबहार, रियासत के प्रधानमंत्री आदिल खान पर डोरे डालने की कोशिश करती है ताकि वो भी गर्भवती हो जाये. आदिल खान उसकी इन हरकतों का विरोध करता है, दिल बहार उसे जेल में डलवा देती है. आदिल खान की गर्भवती पत्नी को निकाल दिया जाता है. ऐसे में वो बंजारों के साथ रहने लगती है और एक सुन्दर पुत्री को जन्म देती है – आलम आरा. समय बीतता जाता है और आलम आरा को पता चलता है कि उसके परिवार के साथ क्या सुलूक किया गया था. वो अपने हक़ के लिए रियासत वापस जाती है और धीरे धीरे रियासत के राज कुमार आदिल जहांगीर खान से प्रेम कर बैठती है. कहानी कुछ यूँ ख़त्म होती है की आलम आरा अपने पिता को क़ैद से छुड़ा लेती है और उसका प्रेम भी सफल हो जाता है.

हिंदी फिल्मों का पहला गाना और आलम आरा
इस फिल्म के साथ ही, हिंदी फिल्मों में संगीत का भी प्रचलन शुरू हुआ था. पारसी थिएटर से जुड़े हुए आर्देशिर ने फिल्म में 7 गाने भी रखे थे. फ़ीरोज़ शाह मिस्त्री और बी. ईरानी फिल्म के संगीतकार थे. हालाँकि ऐसी कोई जानकारी नहीं है कि किसने कौनसा गाना कंपोज़ किया था. गानों के लिरिक्स के बारे में भी कोई ठोस जानकारी नहीं है मगर इतिहासकार कहते हैं कि फिल्म के लेखक जोसफ खुद गाने लिखने में उस्ताद थे तो इस बात की पूरी गारंटी है कि गाने भी उन्होंने ने ही लिखे हैं. फिल्म का और हिंदी फिल्मों का पहला गाना एक फ़कीर पर फिल्माया और फ़कीर द्वारा गाया गीत है. वज़ीर मोहम्मद खान, जिन्होंने इस फिल्म में फ़कीर की भूमिका अदा की थी, उन्होंने ही ये गीत गाया था – दे दे खुदा के नाम पे प्यार, ताक़त है गर देने की. गाने के रिकॉर्डिंग कहीं उपलब्ध नहीं है क्योंकि फिल्मों के गानों के रेकॉर्ड्स रिलीज़ करने का प्रचलनक 1933-34 के आसपास शुरू हुआ था. आलम आरा को दो बार रीमेक किया गया था, 1956 और 1973 में. दोनों बार वज़ीर मोहम्मद खान ने ये गाना फिर से गाया और रिकॉर्ड किया था. दोनों ही बार इस गाने को फिल्म के साउंड ट्रैक में रिलीज़ नहीं किया था, हालाँकि फिल्म में रखा गया था. फिल्म के बाक़ी गाने ज़ुबैदा ने गाये थे और उन्ही पर फिल्माए गए थे. एक गाना जिल्लू ने भी गाया था. इन 7 गानों ने हिंदी फिल्म संगीत को आवाज़ दी. पारसी थिएटर से प्रभावित अंदाज़ में लिखे, संगीतबद्ध किये और गाये इन गानों का कोई रिकॉर्ड नहीं है. ये सब गाने छुपे हुए माइक्रोफोन की मदद से रिकॉर्ड किये गए थे. इंस्ट्रूमेंट के नाम पर सिर्फ हारमोनियम और तबला था, जो कि थोड़ी दूर पर बजाये जा रहे थे ताकि वो कैमरा में नज़र न आ जाएं.

कैसे मिली आलम आरा को आवाज़
इस फिल्म की शूटिंग भी एक ऐसा कठिन कार्य था कि आर्देशिर की जगह कोई और शख्स होता तो कभी ये फिल्म नहीं बनाता या बीच में छोड़ के बैठ जाता. पहली बोलती फिल्म बनाने के लिए तकनीक तो अमेरिका से मंगाई जानी थी. हॉलीवुड के साउंड रिकॉर्डिंग एक्सपर्ट विल्फोर्ड डेमिंग जूनियर को मुंबई बुलाया गया ताकि वो लाइव रिकॉर्डिंग का तकनीकी ज्ञान आर्देशिर को दे सकें. उन दिनों तनर रिकॉर्डिंग सिस्टम हुआ करता था जो साउंड को सीधे फिल्म पर रिकॉर्ड करता था. इसके इस्तेमाल की तकनीकी जानकारी होना बहुत ज़रूरी था. इम्पीरियल स्टूडियोज के मैनेजर और आर्देशिर के साथी वकील रुस्तम भरुचा और आर्देशिर ने विल्फोर्ड से इक्विपमेंट्स का इस्तेमाल करना सीखना शुरू किया. इसके पीछे व्यावसायिक कारण था कि विल्फोर्ड की रोज़ाना की फीस थी 100 रूपया जो कि उस समय के हिसाब से भी बहुत ज़्यादा थी. बोलती फिल्म होने के नाते नयी टेक्नोलॉजी हो रहा था. वीडियो और ऑडियो एक साथ रिकॉर्ड किये जाते थे. अब मज़े की बात ये थी कि जिस स्टूडियो में शूटिंग हो रही थी वो था रेल की पटरी के पास. जब जब ट्रेन गुज़रती, उसकी आवाज़ भी रिकॉर्ड हो जाती. इस लिए तय किया गया कि शूटिंग सिर्फ रात को होगी. वो भी 1 बजे से 4 बजे तक क्योंकि इस दौरान कोई ट्रेन नहीं गुज़रती। एक साइलेंट फिल्म की शूटिंग इस से एक तिहाई समय में हो सकती थी मगर टेक्नोलॉजी और रात की शूटिंग की वजह से इस फिल्म का बजट करीब करीब 40000 रुपये हो गया था. आलम आरा से पहले जो भी फिल्में शूट होती थीं वो स्टूडियो में आउटडोर शूट होती थी, सूरज की रौशनी और रेफ्लेक्टर्स का इस्तेमाल किया जाता था. लेकिन आलम आरा के लिए आर्देशिर ने सारी की सारी शूटिंग स्टूडियो के अंदर सेट बना कर की और बहुत हैवी लाइटिंग लगायी थी ताकि दिन का एहसास हो सकते. डायलॉग रिकॉर्ड करने के लिए आर्देशिर ने माइक्रोफोन्स को अलग अलग जगह छुपा के लगाया ताकि आवाज़ ठीक से आ सके. फिल्म में आर्देशिर ने बहुत बड़ा दांव खेला था. इन सबसे महत्वपूर्ण एक बात और थी, आर्देशिर ने पूरी यूनिट को मना कर रखा था कि कभी भी, किसी से भी, भूल के भी ये ज़िक्र न कर दें की वो एक बोलती फिल्म यानी टॉकी शूट कर रहे हैं. जब तक आलम आरा बन के तैयार नहीं हो गयी और उसकी पब्लिसिटी शुरू नहीं हुई, तब तक किसी को कानोकान खबर नहीं थी कि आर्देशिर ईरानी ने 78 कलाकारों के साथ एक टॉकी फिल्म बना ली है.

पौराणिक और ऐतिहासिक कहानियों के अलावा ग्रामीण परिवेश और दादा दादी की कहानियों और किस्सों की कभी कमी नहीं रही.

तकरीबन हर शो में पुलिस ने भीड़ संभाली
शूटिंग के बाद आयी बारी फिल्म की पब्लिसिटी की. मुंबई के गिरगाँव इलाके में बने मैजेस्टिक थिएटर में आलम आरा का प्रदर्शन हुआ. उसमें नयी मशीन लगायी गयी ताकि आवाज़ भी सुनाई दे. एक विज्ञापन में लिखा था – बोलते, गाते और नाचते कलाकार देखिये. एक पोस्टर पर लिखा था – सभी जीवित. सांस लेते हुए और 100 % बोलते कलाकार. फिल्म की सफलता के बाद तनर साउंड सिस्टम ने भी विज्ञापन देना शुरू कर दिए. फिल्म के हिंदी विज्ञापन में लिखा गया था – 78 मुर्दा इंसान, ज़िंदा हो गए. उन्हें बोलते देखो. पब्लिसिटी ने धूम मचाना शुरू कर दी. चार आना या पच्चीस पैसे का टिकट था. पहले शो से थिएटर के बाहर भीड़ जमा हो गयी. उन दिनों कोई लाइन में लग कर टिकट लेने का सिस्टम तो था नहीं. फिल्म रिलीज़ के दिन सुबह से ही लोग गए. दिन गुज़रता गया, शो का टाइम जैसे जैसे नज़दीक आ रहा था, भीड़ अनियंत्रित होती जा रही थी. एक पल तो ऐसा भी था कि आर्देशिर, अब्दुल्ला और फिल्म के बाकी लोग भीड़ को चीर कर अंदर थिएटर तक नहीं जा पा रहे थे. रास्ते में ट्रैफिक जैम हो गया था. संभवतः पहली बार टिकट ब्लैक भी आलम आरा में ही हुआ था. वो टिकट बिका था 5 रुपये मे. यानी 20 गुना कीमत पर. भीड़ इतनी अनियत्रित हो गयी कि पुलिस बुलानी पड़ी और तकरीबन हर शो में पुलिस की मौजूदगी ज़रूरी रही. मैजेस्टिक सिनेमा में ये फिल्म 8 हफ़्तों तक दिखाई गयी. शाम 5.30, 8 और रात 10 बजे शो का समय रखा गया था. आर्देशिर ने मुंबई के बाहर कई शहरों के डिस्ट्रीब्यूशन अधिकार दूसरी कम्पनीज को दिए और मोटा पैसा कमाया और इन सबके साथ ही कई शहरों में वो पूरी टीम को ले कर जाते और वहां फिल्म रिलीज़ करते.

कहते हैं आर्देशिर को एक बार 14000 रुपये की लाटरी लगी थी जिसके दम पर वो फिल्मों की मायावी दुनिया में आ पाए थे, हालाँकि इतिहासकारों का मानना है की आर्देशिर ने एलेग्जेंडर सिनेमा में दादा साहब फाल्के की फिल्में कालिया मर्दन और कृष्ण जन्म प्रदर्शित की थी. इनकी रिकॉर्ड तोड़ सफलता से प्रेरित हो कर आर्देशिर ने फिल्म बनाने की दुनिया में पूरी तरह एंट्री ली थी. आलम आरा ने उन्हें न केवल अजर अमर कर दिया बल्कि उनकी जेब इतनी भर दी कि आर्देशिर ने इसके बाद दो और ऐसी फिल्में बनायीं जिन्होंने ईरानी के महत्त्व को स्वर्ण अक्षरों में लिख दिया. 1931 में ही उन्होंने नूरजहां नाम की फिल्म बनायीं थी, जो भारत में बनी पहली अंग्रेजी फिल्म थी. उन्होंने 1937 में हिंदुस्तान की पहली रंगीन फिल्म बनायीं – किसान कन्या. वैसे तो पहली रिलीज़ हुई कलर फिल्म थी वी. शांताराम की “सैरंध्री” मगर उसकी पूरी कलरिंग की तकनीक और कलरिंग का काम जर्मनी में हुआ था, जबकि किसान कन्या का सारा का सारा काम हिंदुस्तान में हुआ था. उनकी कई साइलेंट फिल्में बाद टॉकी के तौर पर फिर से बनायीं गयी. उन्होंने आलम आरा के ही सेट पर कालिदास नाम की फिल्म का निर्माण किया जो भारत की पहली तमिल और तेलुगु टॉकी फिल्म बनी. आर्देशिर ईरानी ने अपनी ज़िन्दगी में कुल 138 फिल्म्स बनाई जिसमें से सिर्फ 11 फिल्में उन्होंने निर्देशित की. इन 11 फिल्मों में आलम आरा के अलावा, दुनिया की पहली पर्शियन भाषा की फिल्म “लोर गर्ल” का निर्देशन भी किया था. ईरान में रिलीज़ होने वाली, ईरानी कलाकारों वाली पहली बोलती फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया था.

अब कहाँ है आलम आरा?
14 मार्च 1931 को मैजेस्टिक सिनेमा, मुंबई में रिलीज़ आलम आरा, हिंदी फिल्मों का एक ऐसा दस्तावेज़ है जो दुर्भाग्यवश सहेजा नहीं जा सका. आर्देशिर ईरानी की मृत्यु 1969 में हुई और इस वजह से इस फिल्म से जुडी कुछ जानकारियां उपलब्ध हो सकीं. वर्षों से आलम आरा के प्रिंट या नेगेटिव की तलाश जारी है. मिलना मुश्किल है. फिल्म के कुछ फोटोग्राफ्स उपलब्ध हैं. वज़ीर मोहम्मद खान ने 1973 में बनी आलम आरा में जो गाना गया था “दे दे खुदा के नाम पे”, उसकी रिकॉर्डिंग यूट्यूब पर मिल जाती है. इसके अलावा फिल्म की पब्लिसिटी वाले पोस्टर्स और विज्ञापन भी नज़र आ जाते हैं. जो नहीं मिलती वो है फिल्म. तकनीकी रूप से फिल्म कोई बहुत अच्छी नहीं थी क्योंकि सभी के लिए लाइव साउंड के साथ काम करने का ये पहला मौका था. कभी कोई कलाकार ज़ोर से बोलता था तो कभी धीरे. फिर भी आलम आरा ने एक काम जो शुरू किया वो था साइलेंट फिल्म्स के दौर को ख़त्म करना. धीरे धीरे टॉकी फिल्मों का दौर ज़ोर पकड़ता गया. कई एंग्लो इंडियन और ज्यूइश कलाकार जिनकी हिंदी, उर्दू अच्छी नहीं थी, वो फिल्मों से बाहर हो गए. वो सभी कलाकार जिनकी आवाज़ दमदार नहीं थी, वो भी काम को तरसने लगे. सिर्फ सुन्दर दिखने वाले नहीं, बढ़िया आवाज़ और बढ़िया डायलॉग डिलीवरी वाले कलाकारों का सम्मान होने लगा. नाटक की दुनिया में काम करने वाले कलाकारों को शुरू शुरू में फिल्मों की डायलॉग डिलीवरी से दिक्कत हुई मगर धीरे धीरे वो भी फिल्मों में काम पाने लगे. आलम आरा के रिलीज़ होने 3 हफ्ते बाद ही मादन थिएटर की बंगाली टॉकी फिल्म “जोमाई षष्टी” रिलीज़ हुई. इसके बाद की जो दौर आया वो था बोलती फिल्मों का. वैसे आलम आरा का मतलब होता है “पूरी दुनिया का गहना”… और हिंदी फिल्म इतिहास का ये गहना अब किसी को मिलने से तो रहा, मगर वह अपनी पहचान कायम कर चुका है.
(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)

ब्लॉगर के बारे में

विप्लव गुप्ते

विप्लव गुप्तेलेखक

विप्लव कॉलेज के समय से ही पत्र-पत्रिकाओं में लिखते रहे हैं. भारत में एफएम रेडियो की व्यवस्थित शुरुआत से जुड़े विप्लव ने करीब 18 साल रेडियो के रचनात्मक क्षेत्र को दिए हैं. न्यूयॉर्क फेस्टिवल में पिछले कई वर्षों से रेडियो की ग्रैंड जूरी भी रहे हैं! नौकरी के दौरान फिल्मों से विधिवत परिचय हुआ और तभी से देशी विदेशी फिल्में, वेब सीरीज, फिल्म संगीत जैसे विषयों पर लिखने का सिलसिला शुरू हुआ, जो अब तक जारी है.

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