बीएचएभारत में 50 भाषाओं में फिल्में बनती हैं। लगभग पचहत्तर प्रतिशत फिल्में बॉलीवुड के बाहर बनती हैं। हिंदी के अलावा अन्य समकालीन फिल्में, हालांकि उनके निर्माता-निर्देशकों का उल्लेख मुख्यधारा के मीडिया में कम ही होता है। सच तो यह है कि बॉलीवुड का इतना दबदबा है कि हमें दूसरी भाषाओं की फिल्मों को क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों के खाते में डालने से ब्रेक मिल जाता है, जबकि बंगाली और मराठी समाज की सिनेमा के विकास में ऐतिहासिक भूमिका रही है।

इंटरनेट और डिजिटल तकनीक के विस्तार के साथ, हाल के दशक में क्षेत्रीय भाषाओं में बनी फिल्में भी देखी जा रही हैं, जिन्हें दर्शकों द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर सराहा जा रहा है। ये फिल्में पहले केवल हिंदी क्षेत्र में फिल्म समारोहों तक ही सीमित थीं। यहां हम बॉलीवुड की दुनिया से दूर एक ऐसे साधक की बात कर रहे हैं, जो पिछले पचास सालों से सिनेमा निर्माण और निर्देशन में सक्रिय है, जिसकी पहचान राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय जगत में है। मलयालम फिल्मों के जाने माने निर्देशक अदूर गोपालकृष्णन 3 जुलाई को अस्सी साल पूरे कर रहे हैं।

अदूर सत्यजीत रे को अपना गुरु मानते थेसिनेमा में योगदान के लिए प्रतिष्ठित दादा साहब फाल्के पुरस्कार प्राप्त करने वाले अदूर गोपालकृष्णन सत्यजीत रे के बाद देश के अग्रणी ‘ओटार’ यानी फिल्म निर्देशक माने जाते हैं। अदूर खुद सत्यजीत रे को अपना गुरु कहते हैं। आश्चर्य नहीं कि आलोचक उनकी फिल्मों में उनकी मानवतावादी दृष्टि की चर्चा करते हैं। वह मानते हैं कि उन्हें सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन जैसे फिल्म निर्माताओं की कंपनी का सौभाग्य मिला। इन तीनों निर्देशकों ने बंगाली में सिनेमा की नई धारा को मजबूत किया।

अदूर गोपालकृष्णन की जड़ें केरल के एक छोटे से शहर अदूर में हैं, जो उनके नाम से जुड़ा है। अपनी युवावस्था में उनका रंगमंच से गहरा नाता था। सालों पहले एक मुलाकात में उन्होंने मुझसे कहा था कि ‘मुझे कॉलेज के दिनों में नाटकों में दिलचस्पी थी। मैंने फिल्म के बारे में कभी नहीं सोचा। जब मैंने १९६२ में पुणे फिल्म संस्थान में प्रवेश लिया, तो मुझे देश-विदेश की बेहतरीन फिल्में देखने को मिलीं। मुझे लगा कि यह मेरा क्षेत्र है, जिसमें मैं खुद को बेहतर तरीके से व्यक्त कर सकता हूं।

ऋत्विक घटक पुणे के फिल्म संस्थान में उनके शिक्षक थे। वहां से सात साल के प्रशिक्षण के बाद, उन्होंने अपनी पहली फिल्म ‘स्वयंवरम (1972)’ बनाई, जिसने चार राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। इस फिल्म के जरिए लोगों को एक युवा निर्देशक की एक अलग ही आवाज सुनने को मिली। यह स्वर मलयालम सिनेमा में समानांतर सिनेमा का उत्थान साबित हुआ, जिसकी गूंज आज भी मलयालम फिल्म के युवा निर्माता-निर्देशकों में सुनाई देती है।फिल्मों के जरिए अपने अनुभव बयां करते थे अदूर
हाल ही में बातचीत के दौरान अदूर ने बताया कि “फिल्म मूल रूप से दर्शकों के साथ साझा करने का मेरे लिए एक अनुभव है। और ये अनुभव साझा करने लायक होने चाहिए।” दर्शकों के साथ इस अनोखे अनुभव को साझा करने के लिए, वह अपने पूरे फिल्मी करियर में व्यावसायिक फिल्मों के दायरे से बाहर रहे। फिल्म ‘स्वयंवरम’ में कोई डांस और गाना नहीं था। सिनेमा निर्माण के व्यावसायिक दायरे से बाहर होने के कारण, उन्होंने अपने पूरे करियर में केवल बारह फिल्मों का निर्देशन किया है।

गौरतलब है कि अदूर ने विषय के मामले में किसी भी फिल्म में खुद को रिपीट नहीं किया। यह उनके फिल्मी सफर को देखकर जाहिर होता है। जहां ‘एलिप्पथम’ स्वतंत्रता के बाद के सामंती समाज और घुटन को दर्शाता है, वहीं ‘मुखमुखम’ फिल्म के केंद्र में एक मार्क्सवादी राजनीतिक कार्यकर्ता को दिखाता है। ‘अनंतराम’ में हम एक फिल्म निर्माता की निर्माण प्रक्रिया से रूबरू होते हैं, जहां वास्तविकता और कल्पना के बीच एक सहज संक्रमण होता है।

यहाँ सृष्टिकर्ता के सामने शाश्वत प्रश्न है कि हम रचना कैसे करें? वहीं ‘मातिलुकल’ में ‘स्वयंवरम’ की तरह आजादी और मुक्ति का सवाल प्रमुखता से उभरा है, हालांकि फिल्म निर्माण के मामले में यह अनंतराम के ज्यादा करीब है। ‘कथापुरुष’ का आत्मकथात्मक स्वर है, इस फिल्म में सामंती सीमाओं को तोड़ा गया है। उन्होंने फिल्म की शूटिंग अपने पुश्तैनी घर में भी की थी। अदूर का सिनेमा आजादी के बाद परंपरा और आधुनिकता के संघर्ष, बदलती राजनीति के संदर्भ में केरल की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों को दर्शाता है। विभिन्न स्तरों पर विस्थापन और पहचान की तलाश है।

फिल्मों में समाजवाद और विचारधारा का अहम स्थान है
विषय वस्तु में विविधता हो सकती है, लेकिन अदूर की फिल्मों में, केरल की संस्कृति एक धागा है जो उनकी पूरी फिल्म यात्रा को बताती है। वह अभी भी फिल्म निर्माण में सक्रिय हैं। पिछले साल उनकी शॉर्ट फिल्म ‘सुख्यंतम’ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रिलीज हुई थी। उनकी फिल्मों में समाजवाद के साथ-साथ विचारधारा का भी बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। वे कहते हैं कि किसी विचार के प्रभाव से बाहर आने में उन्हें बहुत समय लगता है।

सादगी में विश्वास रखने वाले अदूर स्वभाव से मितभाषी हैं। यह उनकी फिल्मों में भी झलकता है। उनकी फिल्में कम बोलती हैं। यहां दर्शकों को अनुभव और कल्पना से चीजों को छवियों और ध्वनि के माध्यम से व्याख्या करना है, अंतराल को भरना है।

यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने कभी किसी अन्य भाषा में फिल्म बनाने के बारे में नहीं सोचा? अदूर कहते हैं- नहीं। वे कहते हैं कि भाषा केवल विचारों की अभिव्यक्ति का साधन नहीं है, उसमें संस्कृति पनपती है। केरल की जलवायु और संस्कृति उनकी फिल्मों में गहराई से समाई हुई है। केरल की स्थानीय भूमि पर खड़े होकर उनकी फिल्में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दुनिया में पहुंच चुकी हैं। अदूर का सिनेमा मनोरंजन से परे है और सामाजिक वास्तविकता और विवेक की अभिव्यक्ति प्रस्तुत करता है जो इलाके और समय की सीमाओं को पार करता है। यही उनकी कला की विशेषता है।
(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के लिए लेखक स्वयं जिम्मेदार हैं। इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से जिम्मेदार नहीं है)

ब्लॉगर के बारे में

अरविंद दास

अरविंद दासपत्रकार, लेखक

लेखक-पत्रकार ने ‘मीडिया का मैप’, ‘द लॉस्ट सिटी इन बेखुदी: नोट्स ऑफ ए जर्नलिस्ट’ और ‘न्यूज इन हिंदी’ पुस्तक प्रकाशित की। एफटीआईआई से फिल्म प्रशंसा पाठ्यक्रम। जेएनयू से पीएचडी और जर्मनी से पोस्ट-डॉक्टोरल रिसर्च।

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